Thursday, April 18, 2019

बचपन के वो पर्दे



उन पर्दों को देख के वो बचपन याद आता है,


जब घर के उन कोनों में ये हवा से यूँ लहराते होते थे।

सुरक्षा और आश्रय के ये प्रतीक, 
जब घर में दौड़ते दौड़ते हम इनसे जान बूझ के टकराते थे।
अपनी लंबाई से हम इन्हें कभी नापा करते थे,
अपने चेहरे, माथे से और वेग से हम इन पर्दों से भी कभी लड़ाई करते थे।
कभी इन्हें अपना जिगरी दोस्त मान के दिल से गले लगाया करते थे,
और कभी कट्टर दुश्मन मान के मुक्के इनपे बरसाया करते थे।
पिताजी की डांट की गर्जन से जब पूरा घर थरथराता था,
हम तो बस इन्ही दीवार से लटके कुछ फ़ीट के कपड़ो को ही ढाल बना के खुद को सुरक्षित महसूस कराना जाना करते थे।
चाहे खेल हो आइस पाइस का, या फिर चंचलता में गोल गोल घूमने का,
हम तो बस इन्ही पर्दों के सहारे खुश होना जाना करते थे।
आज भी जब इनको हम हवा से यूँ लहराते देखा करते हैं,
तो कहीं ना कहीं वो मासूम सी भोली सुरक्षा और क्रीडा को याद करते खुदको पाया करते हैं।

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